सिंगुर, पश्चिम बंगाल…

श्रीरंग वासुदेव पेंढारकर

जो पीढ़ी पहली बार मतदान कर रही है, उन्हे शायद यह नाम याद भी न हो! 2006 में पश्चिम बंगाल के सिंगुर में टाटा ने अपना नैनो कार उत्पादन का कारखाना स्थापित किया था। इस कारखाने की स्थापना हेतु करीब 1000 एकड जमीन का किसानों से अधिग्रहण किया गया था। उस समय पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार थी। ममता बनर्जी तृणमूल कांग्रेस बना कर एक स्थानीय शक्ति बन चुकी थी। उनकी दृष्टि अब दशकों पुरानी कम्युनिस्ट पार्टी को सत्ता से बेदखल कर बंगाल विधानसभा में बहुमत प्राप्त करने पर जमी हुई थी।

ममता को सिंगुर के भूमि अधिग्रहण में वह राजनीतिक अवसर दिखाई दिया जिसकी उन्हें तलाश थी। उन्होंने सिंगुर के किसानों को संगठित कर अधिग्रहण के विरोध में प्रदर्शनों का तूफान खड़ा कर दिया। भीड़ एकत्र कर उग्र प्रदर्शन, हिंसा, पुलिस द्वारा बल प्रदर्शन पर पूरे प्रदेश में बन्द, भूख हड़ताले, आमरण अनशन, दशहरा और दीपावली जैसे त्योहारों पर प्रभावित क्षेत्र में निषेध स्वरूप घरों में अधेंरा रखना जैसी गतिविधियों के माध्यम से आने वाले दो वर्ष लगातार आंदोलन चलते रहे। ममता की मूल मांग थी कि किसानों को उनकी भूमि लौटाई जाए। अन्ततः 2008 में टाटा द्वारा घोषणा की गई कि वे अपना कारखाना बंगाल से हटा कर गुजरात में स्थापित कर रहे हैं। तब कहीं जा कर आंदोलन खत्म हुआ। 2011 में ममता भारी बहुमत के साथ बंगाल की मुख्यमंत्री भी बन गई और आने वाले वर्षों में किसानों को उनकी भूमि लौटा दी गई।

आज इस आंदोलन को लगभग पंद्रह वर्ष बीत चुके हैं। ममता आज भी मुख्यमंत्री के रूप में विराजमान है। लेकिन सिंगुर के किसान की हालत पहले से भी अधिक दयनीय हो चुकी है। उन्हे जमीन तो मिल चुकी है परन्तु उस जमीन पर कांक्रीट और लोहे के कॉलम, बीम, पाइप, प्लेटें आदि अवशेष जमीन में सर्वत्र फैले हुए हैं और गहरे तक उतरे हुए भी हैं। वहां कारों के लिए टेस्टिंग ट्रैक बने हुए है। निर्माण के दौरान के ईंट, गिट्टी, पत्थर, लोहा, सीमेंट आदि ने उस भूमि को कृषि के लायक छोड़ा ही नहीं है। वास्तविकता यह है कि अब सिंगुर की जनता के पास न टाटा की नौकरी है, न टाटा के कारखाने की वजह से उत्पन्न व्यापार के अवसर है और न ही खेती है। कारखाने के अवशेष और खराब मिट्टी की वजह से वहां पैदावार असंभव है। ऐसी स्थिति में कईं किसान सरकार द्वारा बांटे जा रहे 2000/- प्रतिमाह की राशि पर निर्भर हैं।

हाल ही में सिंगुर के नजदीक से गुजर रहे दुर्गापुर एक्सप्रेस मार्ग के निर्माण से क्षेत्र में जमीनों की कीमतें काफी बढ़ गई हैं और सभी कृषक आज पुनः अपनी जमीन विक्रय करने की आस लगाए बैठे हैं परन्तु कारखाने के अवशेषों की वजह से वह भी आसान नहीं है। हां, इन किसानों के कंधों पर सवार हो कर मुख्यमंत्री बनी ममता ने इन्हे अपने हाल पर छोड़ दिया है। 2021 के चुनाव में उनकी पार्टी भारी बहुमत से विजयी होने के बावजूद वे स्वयं सिंगुर क्षेत्र की नंदीग्राम विधानसभा सीट से पराजित हो गई। निश्चय ही वे इस क्षेत्र की जनता से और अधिक नाराज चल रही है।

आज की कठोर वास्तविकता यही है कि सिंगुर की जनता उन पर विश्वास करने, उनका समर्थन करने और उनके लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगा देने की कीमत चुका रही है।

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