श्रीरंग वासुदेव पेंढारकर
बचपन से चुनाव और चुनाव के बाद नतीजे देखते आए हैं। 1985 के पहले रेडियो पर समाचार सुनते थे, उसके बाद से दूरदर्शन पर नतीजे देखना शुरू हुआ। नतीजे आने तक सभी दल अपनी अपनी विजय का दावा प्रस्तुत करते थे। अन्ततः एक दल जीतता था। सामान्यतः सत्ताधारी दल पराजित होता था। पराजित प्रधान मंत्री या मुख्यमंत्री शाम को पत्रकारों से मुखातिब हो कर घोषित करता था कि वह अपनी हर स्वीकार करता है और राष्ट्रपति या राज्यपाल को त्यागपत्र सौंप दिया जाता था।
सही कहूं तो मुझे इस बयान पर हंसी आती थी। हार गए हो भाई अब स्वीकार करने का क्या महत्व है? मुझे वह वक्तव्य बड़ा ही अर्थहीन लगता था। क्योंकि जब चुनाव में हार ही चुके हो तो स्वीकार करने या ना करने से क्या ही फर्क पड़ता है? लेकिन अब जब ऐसे नेता शीर्ष पर पहुंच गए हैं, जिन्हे हार स्वीकार नहीं है, तब उस वक्तव्य और उन नेताओं का मूल्य समझ में आ रहा है। वह वक्तव्य प्रजातांत्रिक मूल्यों और देश की चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं के प्रति आस्था प्रदर्शित करने वाला वक्तव्य हुआ करता था।
आज का विपक्ष सारे चुनाव के पश्चात पुनः EVM का राग अलापने लगा है। ईवीएम हमारे चुनाओँ का हिस्सा बने करीब तीन दशक बीत चुके हैं। अब तक पचासों चुनाव ईवीएम के माध्यम से हो चुके हैं। उनमें अलग अलग दल या गठबंधन विजयी हुए हैं। जो आज विपक्ष में बैठे हैं वे भी कईं बार विजयी हुए हैं। फिर इस व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह कैसे लग सकते हैं?
ईवीएम का मामला कईं बार न्यायालयों में पहुंचा है। हमेशा यही पाया गया कि ईवीएम की व्यवस्था सुरक्षित और साफ सुथरी है। यहां तक कि चुनाव आयोग खुली चुनौती दे चुका है कि आरोप लगाने वाले आएँ और ईवीएम हैक कर के दिखाएं। कोई नहीं पहुंचा!
और यदि वास्तव में विपक्ष यह मानता है कि ईवीएम हैक किए जा सकते हैं तो फिर चुनाव का सारा प्रचार इसी बिंदु पर केंद्रित क्यों नहीं किया? राहुल गांधी हजारों किमी की पैदल यात्राएं क्यों कर रहे थे? यदि भाजपा वास्तव में ईवीएम हैक कर ही विजयी होने वाली है, तो विपक्ष का सारा प्रचार तो बेमानी हो जाता है।
किसी भी तर्क से ईवीएम में गड़बड़ी संभव नजर नहीं आती। नज़र सिर्फ यही आता है कि ईवीएम में गड़बड़ी की बात कर विपक्ष अराजकता फैलाना चाहता है। यह प्रवाद फैलाना चाहता है कि चुनाव की पारदर्शिता संदिग्ध है। ऐसा करते समय उन्हे इस बात की कोई परवाह नहीं है कि इस प्रयास के चलते विश्व भर में देश की बदनामी होना तय है। दुर्भाग्य से ऐसा लगता है कि विपक्ष चाहता ही यही है। वह चाहता कि विश्व में यह भ्रम फैल जाए कि मोदी यह चुनाव गड़बड़ी के चलते जीतें है। ऐसा होने पर मोदी की विश्वसनीयता पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लग जायेगा।
परन्तु विपक्ष यह नहीं समझ पा रहा कि उसकी स्वयं की विश्वसनीयता इतनी गिरी हुई है कि उनकी बात पर जनता को कोई विश्वास है ही नहीं। और फिर जनता स्वयं जा कर मतदान कर के आई है। उसे पता है उसने किसे मत दिए हैं। इसलिए बार बार ईवीएम का मुद्दा उठा कर भी विपक्ष कर कुछ नहीं पा रहा।
गत दो दिनों से विपक्ष जो व्यवहार कर रहा है, दिखा रहा है, उससे कुल इतना ही समझ आ रहा है कि इस विपक्ष में विजयी होने का माद्दा तो है ही नहीं हारने का का शउर भी नहीं है। उन्हे न प्रजातांत्रिक मूल्यों की चिंता है न देश की संस्थाओं में आस्था है। उन्हे सिर्फ अव्यवस्था फैलाना आता है और वे चाहते भी यही है।

