श्रीरंग वासुदेव पेंढारकर
2024 आम चुनाव में भाजपा की सीटों में कमी अप्रत्याशित और स्तब्ध कर देने वाली रही है। हम जैसे राजनीति में रुचि रखने वाले मोदी भक्तों को यह विश्वास था कि किसी भी स्थित में एनडीए की सूची गत चुनाव के 350 के आंकड़े के नीचे नहीं आयेगी। आशा थी कि उत्तर,मध्य और पश्चिम भारत के भाजपा के वर्चस्व में कोई बड़ी कमी नहीं आएगी और उड़ीसा, बंगाल तथा दक्षिण में कुछ स्थान बढ़ जाएंगे। 375- 400 की आशा इसी तर्क के आधार पर थी।
निश्चित ही यह तर्क चार प्रदेशों में पूर्णतः गलत सिद्ध हुआ। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और बंगाल। इनमे से महाराष्ट्र में करीब 23 स्थानों का नुकसान निश्चित ही भाजपा द्वारा की गई राजनीतिक उठापटक का परिणाम रहा है। अजीत पवार और अशोक चव्हाण जैसों को भाजपा में शामिल करना लोगों को रास नहीं आया।
बंगाल में गत चुनाव में भाजपा ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया था इस बार उसमें कुछ कमी आई है। निश्चित वहां अभी भाजपा की वैसी पेठ नहीं बनी है कि उसके नतीजे अपरिवर्तनीय बने रहे। बंगाल में आगे भी लम्बा संघर्ष दिखाई दे रहा है और इस संघर्ष के दौरान नतीजे ऊपर नीचे होते रहेंगे।
राजस्थान के नतीजे उतने अप्रत्याशित नही है। भाजपा की सूची में सेंध लगने वाली है यह तो स्पष्ट था हां इतनी सीटें कम हो जाएगी यह उम्मीद नहीं थी।
शेष रहता है उत्तर प्रदेश! गत दो दिनों से यूट्यूब, फेसबुक और अन्य सभी प्रसार माध्यमों पर इस विषय पर गहन चिंतन हुआ है। अधिकांश कारण सतही दिए जा रहे है। दरअसल, अधिकांश चिंतक कोई एक या दो कारण बता रहे हैं जबकि ऐसी घटनाओं के पीछे अनेक कारण होने की संभावना होती है। सच तो यह है कि यह एक अंतहीन बहस है जिसमे बगैर जानकारी के कयास ही लगते रहेंगे।
धरातल पर जो भी कारण नजर आएं उनके पीछे की नीति और सोच जरूर देखी जा सकती है। उत्तर प्रदेश के नतीजे ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि सतत झूठ फैलाया जाता रहे तो कभी न कभी जनता के किसी न किसी वर्ग को फुसलाया जा सकता है। विगत दस वर्षों से विपक्ष निरंतर एक ही नीति पर काम कर रहा है, मोदी सरकार के विरुद्ध झूठे और भ्रामक आरोप का शोर मचाते रहना और साथ में आर्थिक रूप से देश और समाज को बर्बाद कर देने वाले लोकलुभावन वादे करते रहना।
झूठे प्रचार के रूप में पहले राफेल सौदे को उछाला गया, पेगासस फोन टैपिंग के आरोप लगे, अडानी के नाम पर भ्रम फैलाया गया, ईवीएम के आरोप लगाए गए, एससीएसटी एक्ट में बदलाव की कहानी गढ़ी गई, आरक्षण हटाने के आरोप लगाए गए, संविधान बदल देने के इरादे की अफवाह फैलाई गई, साथ ही रोहित वेमूला जैसे कई मामले और भ्रम एक सुव्यवस्थित तंत्र के माध्यम से देश ही नहीं विदेश में भी उठाए गए। ये तमाम आरोप विभिन्न न्यायालयों में निर्मूल और आधारहीन सिद्ध हुए। केजरी और राहुल जैसे शीर्ष नेताओं को न्यायालयों में माफी मांगनी पड़ी। राहुल का तो दोष सिद्ध हो कर निचली अदालत ने उन्हे दो वर्ष कारावास की सजा भी सुना रखी है। परन्तु उसके बावजूद उनका झूठ आधारित प्रचार जारी है। वे सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि नरेंद्र मोदी की शक्ति उनकी छवि है और यह कि उनका लक्ष्य उस छवि को बिगाड़ना है। उन्होंने यह सोचने कहने की जहमत नहीं उठाई कि नरेंद्र मोदी की यह छवि क्यों और कैसे बनी है। इसी प्रकार सोनिया भी यह कह चुकी है कि भाजपा को सत्ता से ‘किसी भी कीमत पर’ हटाना है। ये कीमत कौन चुकाएगा? देश की जनता?
प्रचार के दौरान राहुल या अन्य विपक्षी नेताओं से कभी कोई सकारात्मक और रचनात्मक योजना या विकल्प सुनाई दिया है? क्या कभी राहुल ने यह कहा है कि मोदी 5 ट्रिलियन अर्थ व्यवस्था कि बात कर रहे हैं पर हम इसे उसी समय सीमा में 6 ट्रिलियन तक ले जा सकते हैं? मोदी 2047 तक भारत को विकसित देश बनाने की बात कर रहे हैं। क्या राहुल ने यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया है कि उनका दल ऐसा कुछ वर्ष पूर्व कर सकता है? क्या उन्होंने करों के सम्बंध में कोई नई नीति की बात की है? क्या रक्षा सम्बंधी उनके पास कोई बेहतर विकल्प है? देश में मोदी सरकार ने विगत दस वर्षों में जो भव्य इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा किया है उसे और भव्य कैसे बनाया जा सकता है इस पर राहुल ने कभी कुछ कहा है? विगत दस वर्षों ने जिन प्रदेशों में कांग्रेस या अन्य विपक्षी दलों की सरकारें बनी है, क्या वे कोई भी ऐसा काम दिखा पाए हैं जो भाजपा सरकारों से बेहतर हो?
विपक्ष देश संबंधी कोई लक्ष या नीति लेकर चल ही नहीं रहा है। उन्हे मोदी को हटाना है। उन्हे सत्ता चाहिए। सत्ता का क्या करेंगे इसकी कोई स्पष्टता नहीं है। उसकी बजाय सारा बल जनता को भ्रमित करने पर है। एग्जिट पोल आने के बाद ऐसा लगने लगा था कि यदि परिणाम भी इसी प्रकार के आते हैं तो संभवतः यह झूठे आरोप और हिंदू समाज को बांटने की राजनीति का युग बीत जायेगा। दुर्भाग्य से परिणाम विपक्ष का उत्साह बढ़ाने वाले आए हैं।
उत्तर प्रदेश के परिणाम सतत झूठ की, अभूतपूर्व विकास पर विजय है। उत्तर प्रदेश की जनता ने स्पष्ट संदेश दिया है कि चौड़े मार्ग, विशाल पुल, पर्यटन जनित व्यापार में गुनों की बढ़ोतरी, बेहतर कानून व्यवस्था, माफिया पर नियंत्रण आदि के आधार पर मत मिलना आवश्यक नहीं है। उन्होंने प्राप्त हो चुके परिणामों के स्थान पर भविष्य के वादों और भ्रामक भय को प्राथमिकता दी है।
भारतीय राजनीति के लिए यह शुभ शगुन नहीं है।

