इमरोज़ गुजर गए!

श्रीरंग वासुदेव पेंढारकर

कौन थे इमरोज़? एक चित्रकार…. गत कईं दशकों से सुन रहे हैं कि इमरोज़ एक चित्रकार हैं। ये अलग बात है कि आज तक कहीं उनकी तस्वीर देखने को नहीं मिली। अब आज गूगल पर तो मिल ही जाएंगी परन्तु गूगल इजाद के होने के बहुत पहले से अमृता शेरगिल और हैदर रजा जैसे कलाकार अपनी तस्वीरों के चलते प्रसिद्ध हो चुके थे। इमरोज़ कभी भी अपनी तस्वीरों के लिए नहीं जाने गए। उनकी कला कभी उनकी पहचान नहीं थी।

फिर इमरोज़ प्रसिद्ध क्यों हुए?

इसका एक ही जवाब है…..अमृता प्रीतम से बगैर विवाह किए उनके साथ रहने के लिए। और साथ रहते हुए अमृता को दूसरों के साथ इश्क करने देने के लिए। जब लिव इन शब्द हमारे शब्द कोष में नहीं आया था तब इमरोज़ और अमृता साथ रहते थे। विवाहेतर संबंधों को समाज में स्वीकृति दिलवाने के लिए अमृता और इमरोज एक तरह से Ecosystem के ब्रांड एम्बेसडर थे।

अमृता को 1982 में ज्ञानपीठ से नवाजा गया था। देश का साहित्य का सर्वोच्च सम्मान! स्वाभाविक रूप से पूरा देश उन्हे पहचानने लगा। हालांकि यदि सौ लोग उनके बारे में जानते थे तो उनमें से बमुश्किल पांच ने उनकी कोई किताब पढ़ी हो। लेकिन वे छद्म नारी स्वतन्त्रता की पोस्टर गर्ल थी। चाहे किसी ने उनकी पुस्तक न पढ़ी हो और इमरोज़ के चित्र न देखे हो, परन्तु यह जानकारी सब जगह उपलब्ध करा दी गई थी कि कैसे अमृता, साहिर लुधियानवी के इश्क में दीवानी थी…और यह भी कि वे साहिर के जाने के बाद उनकी फूंकी हुई सिगरेट के टुकड़े जला कर अपने होठों पर रखती थी, ……और यह भी कि कैसे इमरोज़ के स्कूटर पर उनके पीछे बैठ कर उन्ही की कमीज पर अपने नाखूनों से ‘साहिर’ लिख देती थीं……

विवाहेतर संबंधों की निर्लज्जता को फिल्मी दुनिया के बाहर समाज में प्रतिष्ठित कराने की पहल करने वालों में इमरोज़ और अमृता अग्रणी थे। अपने बारे में ये सारी जानकारियां अमृता ने स्वयं ही अपने साक्षात्कारों और रसीदी टिकट के नाम से प्रकाशित आत्मकथापारक पुस्तक के माध्यम से आम की थी। विवाह प्रीतम सिंह से, दो बच्चे भी, इश्क साहिर से, लिव इन इमरोज़ के साथ। उनकी इस जीवन शैली को दशकों तक परिकथा की तरह परोसा गया।

यही इमरोज़ की मुख्य पहचान थी।

बाकी ईश्वर शांति तो प्रदान करेंगे ही!

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