माता पिता और बच्चों के बीच बढ़ता..’ कम्युनिकेशन वॉर

राजेश्वरी भट्ट 

आधुनिकीकरण की तीव्र गति को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते इससे कुछ भी अछूता नहीं रह सका है। पारिवारिक रिश्तों पर भी इसका प्रत्यक्ष प्रभाव देखा जा सकता है।पुरानी पीढ़ी,पूरब और नवीन पीढ़ी पश्चिम की सोच का प्रतिनिधित्व कर रही है।युग का यह परिवर्तन सकारात्मक नहीं है,विशेष कर भारतीय संस्कृति और परिवारों के लिए।

आधुनिक माता -पिता बच्चों को समय नहीं,हाथ में मोबाइल दे रहे हैं और यही कारण है कि माता – पिता और बच्चों के मध्य संवाद हीनता(कम्युनिकेशन) का शीत युद्ध छिड़ा हुआ है जिसमें माता – पिता अपने बच्चों को,खो रहे हैं!माता-पिता, स्वयं ही इतने अधिक व्यस्त और तनाव ग्रस्त रहते हैं कि बच्चों के जीवन में सही,गलत क्या चल रहा है उन्हे कुछ भी ज्ञात नहीं होता और अचानक कुछ ऐसा ज्ञात होता है जो अप्रत्याशित होता है,तीर कमान से निकल चुका होता है और हालात वश में नहीं होते।

माता और पिता इन दो स्तंभों पर भारतीय संस्कृति दृढ़ता से स्थिर रही है। माता-पिता भारतीय संस्कृति के दो ध्रुव हैं और यही अपनी संतान को साहस, करुणा, त्याग, परोपकार, और प्रेम के साथ जीवन जीने की कला सिखाते हैं परंतु अब तो उनके पास समय ही नहीं कि यह सब सिखाये।वर्तमान समय में भावनात्मक रूप से अपरिपक्व माता-पिता की बच्चों से विचार विनिमय के संबध में कोई स्पष्टता दिखाई नहीं देती हैं,इसका एक बहुत बड़ा कारण है,आज की gen. z से व्यवहार करने वाले माता- पिता स्वयं ही इस डिजिटल युग की पीढ़ी को लेकरअसमंजस की स्थिति में है कि इन्हे कितनी स्वतंत्रता देना है और कितना अनुशासन में रखना है। यह सोच भी होती है कि अगर हम बच्चों से ज्यादा बातें करेंगे तो बच्चे हमारा सम्मान नहीं करेंगे। बस यही से उनके और बच्चों के मध्य संवादहीनता का अंकुर फूटता है जो समय के साथ अपनी जड़ों को मजबूत और रिश्तों को खोखला कर देता है।जब ‘रिश्तों की जड़ में कीड़ा लग जाता है तब टहनियां सुख जाती हैं’ बच्चों के लिए,माता पिता मात्र उनकी आवश्यकताएं पूर्ण करने का जरिया बन जाते हैं।

आजकल ‘ स्पेस’ शब्द भी बहुत प्रचलित है।हमें अपने ही परिवार में,अपने ही लोगों से ‘ स्पेस ‘ चाहिए।बच्चों,बड़ों को उनका अलग कमरा चाहिए और यही कमरा,परिवार को विभक्त कर देता है।दरवाजे पर दस्तक दिए बिना आपका प्रवेश, असभ्यता माना जाता है तो फिर कैसे आप एक दूसरे के साथ निसंकोच संवाद कर पाएंगे? बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं कि पारिवारिक रिश्ते तेजी से बदल रह रहे हैं और परिवार का पुराना स्वरूप चरमरा रहा है।

कोरोना काल ने प्रत्येक बच्चे के हाथ में मोबाइल थमा दिया और दुष्परिणाम स्वरूप तकनीक ने बच्चों को समय से पहले बड़ा कर दिया। सोशल मीडिया पर बच्चों ने स्वयं के लिए कई विकल्प खोज रखे हैं,जहां वयस्क कम ही होते हैं।वह स्नैप चैट,टिंडर, बंबल,सिग्नल जैसे दूसरे ऐप का प्रयोग करते हैं,
नए मित्र बनाते हैं जिनकी आपको कोई जानकारी नहीं होती।आपके पास समय नहीं उनके लिए तो वह अपनी भावनाओं को,सुख, दुख को बांटने के लिए अन्य विकल्पों का सहारा ढूंढते हैं, इसका ही अनुचित लाभ दुष्प्रवृत्ति के लोग उठाते हैं,बेटियां लव जिहाद की शिकार बन जाती है और बेटे नशे या अपराधिक तत्वों से जुड़ जाते हैं।

अभी हाल ही का एक मामला है,जैन परिवार का जहां उनका बेटा जिम जाने का कहकर दिन में पांच बार मस्जिद, नमाज पढ़ने जाता था, जब पिता को संदेह हुआ कि इतनी बार बाहर क्यों जा रहा है,पिता ने पीछा किया, तब पता चला कि बेटा गलत संगत में पड़कर अन्य धर्म की राह पकड़ चुका है।बेटियों के साथ जो अपराध घटित हो रहे हैं वह तो और भी अधिक विभत्स और अवाक कर देने वाले हैं।The Kerala story इसका ताजा उदाहरण है।भविष्य में आपके बच्चे आपसे से प्रश्न करेंगे कि जब उन्हें आपकी सबसे अधिक आवश्यकता थी तब आप कहां थे?

बच्चों से संवाद क्यों आवश्यक है ..??

युवा होते बच्चों पर उन्नत भविष्य के निर्माण का अत्यधिक भार है। प्रतियोगी युग उनसे किताबी ही नहीं अन्य बहुत सी परीक्षाएं लेता है। कभी पारिवारिक स्थिति ठीक नहीं,कभी बाहर पढ़ने जाएं तो वहां घर जैसी सुविधाएं नहीं होती, यह सब भी हो तो अथक परिश्रम के बाद भी मात्र कुछ अंक से पिछड़ जाना उन्हे तोड़ देता है,अवसरों की कमी के कारण अपने भविष्य और सफलता के बारे में असुरक्षित और भ्रमित हो जाते हैं।बेरोजगारी, प्रेम प्रसंग में हताशा, सद् और संस्कार युक्त शिक्षा का अभाव,भ्रामक विचारधाराओं में उलझना, सामाजिक एवं पारिवारिक अनुशासन के प्रति विद्रोह की भावना, आधुनिक जीवनशैली की लालसा जैसे कितने ही बवंडर उनके जीवन में उत्पात मचाए रहते हैं।

बच्चों को समय-समय पर परामर्श देकर,उनसे बात करके उनको सम्हाला जा सकता है।अधिकतर यह होता है कि जब बच्चे अपनी परेशानी हमसे साझा करने का प्रयास करते हैं तब हम अपनी व्यस्तता या उनकी बातों को गैर जरूरी मानकर सुनने से मना कर देते हैं या बाद में सुन लेंगे कहकर उन्हे टाल देते हैं और कई बार यही बात दोहराने पर बच्चे अपने मन की बात या परेशानी कह ही नहीं पाते।कई बार बातें गंभीर भी हो सकती है जिसमें उनके साथ हुआ,यौन शोषण,स्कूल में शिक्षक या सहपाठियों का बुरा व्यवहार, महिला या पुरुष मित्र द्वारा ब्लैकमेल करना,बेटियों की बेमेल शादी या ससुराल में उत्पीड़न और बेटे भी पत्नी द्वारा होने वाले मानसिक उत्पीड़न को व्यक्त नहीं कर पाते। कभी – कभी माता पिता के आपसी झगड़े भी उनकी मनोस्थिति पर अनुचित प्रभाव डालते हैं और परिणाम स्वरूप उनके द्वारा आत्मघाती कदम उठा लिए जाते हैं या मौन हो जाते हैं।बच्चे जो फूल की तरह खिलखिलाते अच्छे लगते हैं, मुरझा जाते हैं।

उत्कृष्ट विद्यालय, ब्रांडेड कपड़े,महंगे फोन, कोचिंग या महंगी गाडियां आपका स्थान नहीं ले सकते।अगर आप बच्चे से स्नेहपूर्ण समझदारी भरा व्यवहार नहीं रखेंगे उनसे विचार विमर्श में कतराएंगे तो वह आपको अपनी परेशानी के बारे में कभी नहीं बताएंगे।मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि बच्चों के माता – पिता के साथ कितने मज़बूत, सुरक्षित और गहरे संबंध हैं, इस बात का उनके जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है।आजकल तो विद्यालयों में भी मनोचिकित्सकों की नियुक्ति की जाने लगी है तो सोचिए की बच्चों की मानसिक स्थिति किस दशा से गुजर रही है।अपने दंभ या अकड़ को, बच्चों से ज़्यादा महत्त्व कभी ना दें, जहां ग़लती हो उसे मानें, जहां हो सके वहां उन्हें भी क्षमा करें।

जब संवाद प्रभावी ढंग से किया जाता है,बच्चों की हर छोटी बड़ी बात को गौर से सुना जाता है,उसमें रुचि ली जाती है तो बच्चे भी निसंकोच अपनी हर बात को साझा करते हैं।उन्हे अनुभव होता है कि उनके माता-पिता उनकी बातों का सम्मान करते हैं,उन्हे महत्व देते है। यही व्यवहार उनके आत्म-सम्मान को बढ़ावा देता है। माता-पिता के साथ बच्चों का आपसी संवाद बच्चों को तनावमुक्त और आत्म विश्वासी तो बनाता ही है,साथ ही वह जीवन की हर कठिनाई से जूझने और समस्या का समाधान ढूंढने में भी सफल होते हैं।संतान से बड़ी कोई पूंजी नही हो सकती माता – पिता के लिए।बच्चों में समय का निवेश कीजिए,यह निवेश आपके बच्चों की रक्षा तो करेगा ही,संतान के उत्तम पालन पोषण का प्रतिफल भी प्रदान करेगा।

महत्वपूर्ण समय बीत जाने पर संवाद शुरू भी हो तो लाभ नहीं होता तो क्यों न आज से ही शुभारंभ करें…

Adv. राजेश्वरी भट्ट बुरहानपुर m.p.

Shar it on Social Networks

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *