श्रीरंग वासुदेव पेंढारकर
34 वर्षों के व्यवसायिक जीवन में से लगभग 22 वर्ष कॉरपोरेट जगत में कटे हैं। एफएमसीजी की मार्केटिंग और सेल्स में कभी हिस्सा तो नहीं लिया परन्तु बहुत नजदीक से इन गतिविधियों को देखा है। यह भी देखा है कि FMCG का विक्रय काफी दुष्कर गतिविधि है। और यह भी कि अक्सर, विक्रय विभाग के लोग कंपनी के शीर्षस्थ पदाधिकारियों / मालिकों को लम्बे समय तक बेवकूफ बनाते रहते हैं। वे प्रबन्धन / मालिकों से नित नए विज्ञापन और सेल्स प्रमोशन सम्बंधी खर्च करवाते रहते हैं। डिस्काउंट की स्कीम चलवाते रहते हैं। बैठकों में झूठे आश्वासन देते रहते हैं। नतीजे न आने पर और नई योजना लेकर आते हैं और प्रबंधन से और अधिक खर्च करवाते हैं। बैठकों में बड़ी बड़ी डींगे हांकी जाति हैं। अपनी मेहनत का हवाला दिया जाता है। प्रतियोगी कंपनी कैसे कम कीमत पर बेहतर गुणवत्ता के उत्पाद बना रही है, यह बताया जाता है। अपने उत्पाद की कमियों के बावजूद उसका विक्रय बढ़ाने के लिए पुनः कोई नई स्कीम या विज्ञापन योजना बनाई जाती है। हर वह खर्च जिसके परिणाम नजर न आए उसे लम्बी अवधि के लाभ के लिये किया गया खर्च बताया जाता है। प्रबन्धन या मालिक जब तक पूरी तरह थक न जाए सब प्रयास करता रहता है तथा धन की व्यवस्था करता रहता है, इस उम्मीद के साथ कि भले अब तक उत्पाद बाजार में चल न पाया हो, इस प्रयास के बाद निश्चित ही चल निकलेगा और इसके बाद धनवर्षा प्रारंभ हो जायेगी।
क्या केजरीवाल और उनके तथाकथित विदेशी आकाओं के बीच भी कुछ ऐसा ही चल रहा है?
ऊपर दिए उदाहरण में महत्वपूर्ण यह है कि शीर्ष प्रबंधन विक्रय विभाग द्वारा दी गई जानकारी को ही सत्य मानता रहता है क्योंकि बाजार की सही जानकारी उसे कहीं ओर से उपलब्ध होती ही नहीं है। विक्रय विभाग अपनी छोटी सफलताओं को विराट रूप दे कर सुनहरे भविष्य का सपना दिखाता रहता है।
इस परिपेक्ष में केजरी का गत दस वर्षों का व्यवहार देखिए। हर बार लोकसभा चुनाव में बड़ी तादाद में उम्मीदवार खड़े करना। स्वयं मोदी के सामने चुनाव लडना। सिर्फ तकनीकि धरातल पर राष्ट्रीय दल हो जाने पर उसका ढिंढोरा पीटना। सतत समाचारों में बने रहना। समाचार पत्रों और समाचार वाहिनियों पर विज्ञापन देते रहना…. ये सारी गतिविधियां विक्रय विभाग की उन गतिविधियों की याद दिलाती है जो असल विक्रय के अभाव में, गम्भीर प्रयासों के रूप में गिनाई जाती है।
केजरीवाल जो कुछ कर रहे हैं या करते आए हैं वह सब कुछ किसी को दिखाने के लिए किया जा रहा ही प्रतीत होता है। ना उनकी कोई निश्चित विचारधारा है, न उनके पास कोई स्पष्ट कार्यक्रम है, न कोई आदर्श नीति निर्धारण है और न कोई ठोस क्रियान्वयन योजना है। ऐसा लगता है, कि वे उस विद्यार्थी की तरह है जिन्हे ज्ञान से कोई लेना देना नहीं है, बस अच्छे अंक हासिल कर किसी को दिखाना है। फिर उसके लिए भले नकल की जाए, या पर्चा ‘आउट’ ही क्यों न करवाना पड़े।
निश्चय ही इस प्रकार का दिखावा लम्बे समय तक चल नहीं पाता। राजनीति में, वह भी प्रजातांत्रिक राजनीति में, सिर्फ बाजीगरी के आधार पर कितने वर्ष राज कर लोगे? भारत के संदर्भ में देखा जाए, तो कईं उदाहरण हैं जहां यह बाजीगरी जनता को अधिकतम दस वर्षों तक भ्रमित कर पाने सफल हो जाती है। दस वर्षों बाद यदि जनता को नया विकल्प उपलब्ध हो तो निश्चय ही वह उस विकल्प को अवसर देती है। UPA सरकार के दस वर्ष इसका ताज़ा उदाहरण है।
यदि इतिहास अपने आप को दोहराता है, तो दिल्लीवासीयों के अच्छे दिन ज्यादा दूर नहीं होना चाहिए!!

