श्रीरंग वासुदेव पेंढारकर
लगभग इतना ही उलझा हुआ प्रश्न है कि मीडिया बकवास दिखाता है इसलिए लोग देखते हैं या लोग बकवास पसन्द करते हैं इसलिए मीडिया को वही दिखाना पड़ता है?
कल सुबह से लगभग सभी मुख्य समाचार वाहिनियां उत्तर प्रदेश के कुख्यात माफिया की मृत्यु के सचित्र समाचार दिखाने में लगा हुआ है। देश में चुनाव के बिगुल बज चुके हैं, देश के अगले पांच वर्ष का भवितव्य इन चुनाओँ में तय होना है। देश में और देश के बाहर अनेक अच्छी बुरी घटनाएं घटित हो रही है, जो हम सब के जीवनों को कहीं ज्यादा प्रभावित कर सकती हैं। लेकिन मीडिया, खून के आरोप में गुनहगार सिद्ध हो चुके ऐसे व्यक्ति की मृत्यु दिखाने में व्यस्त है जो गत पन्द्रह वर्षों से जेल में ही रहा है।
दुःख तो तब होता है, जब ऐसी घटनाएं जो हमारे देश का नाम बढ़ाने वाली हो और जिन पर हम सभी को गर्व करना चाहिए, हमें पता ही नहीं पड़ती।
ऐसी ही एक घटना इसी माह अरब सागर में भारत की सीमा से लगभग 2800 किमी दूर घटी। गत तीन माह से सोमालिया के समुद्री डाकुओं ने एम वी रुएन नामक एक जहाज को बंधक बना रखा था। इस जहाज पर 17 नाविक कर्मचारी थे जिन्हें डाकुओं ने बंधक बना रखा था। न जहाज भारतीय था, न उसके कर्मचारी और न ही उस पर लदा सामान।
17 मार्च 2024 को भारतीय नौसेना ने एक अत्यन्त साहसी और योजनाबद्ध कारवाई के तहत अपने किनारे से करीब 2800 किमी दूर जाकर अपने युद्ध पोत आई एन एस कलकत्ता, हेलीकॉप्टर और पैराट्रूपर्स की मदद से उस जहाज पर कब्जा कर बैठे समुद्री डाकुओं पर हमला कर दिया। बगैर कोई नुकसान उठाए नौसेना ने 35 डाकुओं से आत्मसमर्पण करवा लिया और 17 विदेशी कर्मचारियों को सुरक्षित हालत में छुड़वा लिया! इन कर्मचारियों में बुल्गारिया के नागरिक भी थे। बुल्गारिया के राष्ट्रपति ने सार्वजनिक रूप से भारतीय नौसेना की प्रशंसा की और प्रधानमंत्री मोदी को मदद के लिए धन्यवाद दिया।
अपने तट से 2800 किमी दूर जा कर हथियार बंद 35 डाकुओं से किसी जहाज को मुक्त करा लेना निश्चित ही एक ऐसी दुस्साहस भरी कारवाई है जिसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है। इस पूरी कारवाई में कोई जन हानि भी नहीं हुई। निश्चय ही त्रुटिहीन योजना बनाई गई थी और उसका उतना ही त्रुटिहीन क्रियान्वयन भी हुआ होगा। हमारे जाबांज नौसैनिक पैराशूट की सहायता से उस जहाज पर उतरे और उन्होंने आमने सामने की लड़ाई में डाकुओं को निष्क्रिय कर उन्हे बन्दी बना लिया।
परन्तु हमारा मुख्य धारा का मीडिया तो एक वहशी अपराधी के गुणगान में व्यस्त है। भारतीय नौसेना का पराक्रम दिखाना संभवतः TRP नहीं दिलवाता है। प्रश्न फिर वही है इस के लिए जिम्मेदार प्रसार माध्यम है या फिर हम दर्शक?

