श्री राम की महिमा

श्रीरंग वासुदेव पेंढारकर

वस्तुत: श्रीराम एक जननायक थे। उनका पूरा जीवन जनहित कार्यों में बीता। जिस युग में प्रजातंत्र नहीं था, उस युग में भी उन्होंने अपने आप को जनहित के लिए समर्पित कर दिया था। उनका आम जन से सीधा संवाद था और उन्होंने आम जन के त्रास को हरा था। तपो वन में ताडका, सुबाहु और मारीच हो, पंचवटी में खर दूषण हो या लंका में रावण हो, ये सभी आम जनता और वनवासियों पर अत्याचार करने वाले और आतंक फैलाने वाले थे। माता सीता के अपहरण के निमित्त रावण वध भी दक्षिण के वनवासियों और जनजातियों के लिए आतंक से मुक्ति का अवसर था। राम ने स्वयं के राज्य के लिए या भू विस्तार के लिए युद्ध नहीं लड़ा, वे लड़े समाज के अन्तिम छोर पर खड़े व्यक्ति के लिए। इसलिए उन्होंने विजित राज्य भी सुग्रीव और विभीषण जैसों स्थानीय नेतृत्व को सौंप दिए।

जनहित को राम ने सर्वोपरि रखा। माता कैकई के मांगे वरदानों के कुचक्र में वस्तुत: दशरथ फंसे हुए थे। यदि राम उस समय वन गमन का निर्णय नहीं लेते तो क्या होता? भरत कैसा व्यवहार करते? क्या अयोध्या और उससे भी आगे आर्यावर्त का शक्ति संतुलन अक्षुण्ण बना रहता? रावण के राक्षस तपोवन तक पहुंच कर आतंक फैला ही रहे थे। समुद्र किनारे से लेकर अयोध्या से सटे जंगलों तक रावण का आतंकवाद पैर पसार चुका था। पंचवटी जैसे स्थान पर खर दूषण चौदह सहस्त्र की सेना लेकर उस आतंकवाद को पोषित कर रहे थे। ऐसी स्थिति में यदि अयोध्या में राजगद्दी को लेकर कोई संघर्ष छिड़ जाता तो कौशल, मिथिला आदि सभी राज्य रावण के आतंक का मुकाबला करने में और कमजोर पड़ जाते, और राज्य में त्राहि त्राहि मच सकती थी।

जन हित को सर्वोपरि रखते हुए राघव ने स्वयं आतंक की जड़ की ओर जाने को प्राथमिकता दी। संभवतः उन्हें यह प्रचिति होगी ही कि उनका वानप्रस्थ, दंडक वन तक ही सीमित नहीं रहेगा। दंडक वन में प्रवेश रावण के आतंकी शिविरों के क्षेत्र में प्रवेश था और एक महती संघर्ष अटल था। इस निर्णायक युद्ध के द्वारा जहां आर्यावर्त की आम जनता को रावण के आतंक से बचाए रखना था, वहीं विंध्य पार के वनवासियों और जनजातियों को उसके आतंक से मुक्त करना भी था। इसलिए श्रीराम ने खोखली नैतिकताओं के परे जा कर जनता पर आतंक बरपा रहे ताडका, मारीच, खर, दूषण, बाली आदि का स्वयं संहार किया। ताडका और शूर्पनखा स्त्री थी और स्त्रियां सामान्यतः अवध्य थीं, वहीं बाली को छुप कर मारना पड़ा। परन्तु जन हित सर्वोपरि था। नीति अनीति से भी परे था।

अहल्या, शबरी, निषादराज जैसे प्रसंग हो या दक्षिणी प्रायद्वीप की वानर, रीछ आदि जनजातियां हो श्रीराम ने सभी को गले लगाया, सभी को सम्मान दिया और सभी का रक्षण भी किया। स्वाभाविक ही है कि सहस्त्राब्दियों पश्चात भी राम की जनप्रियता में कोई कमी नहीं आई है और आदर्श सुशासन की कल्पना को आज भी रामराज ही कहा जाता है। कोई आश्चर्य नहीं कि आज जब शताब्दियों की प्रतीक्षा के बाद अयोध्या में राम लला का मन्दिर बना है तो संपूर्ण भारत में उत्साह का वातावरण है। लाखों लोग प्रतिदिन अयोध्या दर्शन हेतु पहुंच रहे हैं। जो नहीं जा सके हैं वे जाने के लिए लालायित हैं। जन नायक राम के लिए जन जन भावविभोर है। आज गुड़ी पड़वा से पावन नवरात्रि का प्रारंभ हो चुका है जिसकी परिणीति राम नवमी को राम जन्म के रूप में होना है।

आप सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं। प्रभु श्रीराम की कृपा सभी पर बनी रहे।

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2 thoughts on “श्री राम की महिमा

  1. *भारतीय नववर्ष (विक्रम संवत 2081) की आप को बहुत-बहुत बधाई।*
    *इस वर्ष आपको ढेर सारी*
    *खुशिया प्राप्त हो।*. Your voice is too good just like magnetic voice. pronunciation is very clear. This is your admirable step

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