‘गणगौर ‘..निमाड़, मालवा का महोत्सव..

राजेश्वरी भट्ट

भारतीय संस्कृति की कहानी एकता,समाधानों के समन्वय एवं प्राचीन परंपराओं के उन्नति की कहानी है।
संस्कृति का सामान्य सा आशय संबंधित है,रीति – रिवाजों, प्रवृत्तियों और मूल्यों के संगठित और दृढ़ ताने – बाने से जो एक पीढी से दूसरी पीढी को हस्तांतरित होते हैं जिसे हम परंपरा भी कह सकते हैं।भारतीय संस्कृति विश्व की प्रधान संस्कृति है, यह कोई गर्वोक्ति नहीं, बल्कि वास्तविकता है।प्रथाओं,भाषाओं, रीति-रिवाज़ों आदि की विविधता देश के प्रत्येक प्रदेश को विशिष्ट बनाती है। और ऐसी ही कुछ विशिष्टता लिए है देश के ह्रदय प्रदेश का निमाड़ और मालवा क्षेत्र।

निमाड़ का जनजीवन कला और संस्कृति से समृद्ध है,यहां की जीवन शैली का एक दिन भी ऐसा नहीं जाता, जब किसी लोक पर्व में गीत न गाये जाते हों, व्रत-उपवास की कथावार्ता न कही-सुनी जाती हो।निमाड़ में अगर त्योहारों का शुभारंभ लोकपर्व जीरोती से होता है तो समापन भी लोकपर्व गणगौर पर ही होता है।दोनों पर्व देवी पूजा और बहू-बेटियों के सौभाग्य से संबंधित विशेष त्योहार है।

लोक पर्वों का वास्तविक उद्देश्य होता है,जन मानस में धार्मिक सामाजिक और अध्यात्मिक चेतना जागृत करना।ऐसा ही एक धार्मिक पर्व है ‘ गणगौर ‘जो यहां, पूर्ण समर्पण,आस्था और विश्वास के साथ मनाया जाता है।चैत्र माह की तीज से आरंभ होने वाला यह महापर्व एक महोत्सव रूप में संपूर्ण, निमाड़-मालवांचल को आलोकित करता है।,’गण’ और ‘गौर’ यहां गण का तात्पर्य है शिव (धनियर राजा) और गौर का अर्थ है पार्वती,(रणु बाई) गणगौर पूजन मां पार्वती और भगवान शिव की पूजा का पर्व है।यह माना जाता है कि माता रणु बाई (पार्वती) होली के दूसरे दिन अपने मायके आती हैं और आठ दिनों के बाद धनियर राजा (शिव) उन्हें वापस लेने के लिए आते हैं तब शिव का दामाद और पार्वती का बेटी के रूप में पूजन किया जाता है और चैत्र शुक्ल तृतीया को उनकी विदाई होती है।

गणगौर माता की महिमा लौकिक ही नहीं अलौकिक भी है यह महापर्व निमाड़ संस्कृति की आत्मा है। गणगौर पर्व नौ-दस दिवस तक उमंग और हर्सौल्लास से मनाया जाता है,कह सकते हैं कि दीपावली से कम रौनक नहीं होती इस पर्व में I निमाड़ में जिन घरों में माता को “पावणी” (अतिथि) लाया जाता है वहां आठ-दस दिन पूर्व से ही तैयारी आरंभ हो जाती है I घर का कोना – कोना साफ किया जाता है, चौक-माणडनों से घर को सजाया जाता है I

गणगौर माता का अनुष्ठान चैत्रवदी ग्यारस से चैत्र सुदी पंचमी तक चलता हैIजिसमे चैत्रवदी को माता की मूठ रखी जाती है I मूठ रखना अर्थात माता के प्रतीक स्वरुप गेहूं के जवारे उगाने हेतु बांस की नन्हीं-नन्हीं टोकरियों में पारम्परिक तरीके से गेहूं बोकर माता की प्राण-प्रतिष्ठा करना I सर्वप्रथम होलिका दहन के स्थान से,राख से बिना थापे,बने कंडे एवं पांच कंकर की गौरा माता घर लाते हैं तभी यह भी निश्चित कर लिया जाता है कि कितने रथ तैयार होंगे।धनियर राजा और रणुबाई के रथ जो बाजुट पर बांस के ढांचे से बनाए जाते हैं,वर्ष भर तैयार रहते हैं।पर्व के दौरान श्रद्धालु इनके मुखौटे व सामग्री बाजार से खरीदते हैं।रणुबाई के लिए साड़ी, ब्लाउज, माला, कमरबंद, नथ, झुमके सहित अन्य शृंगार की सामग्री ली जाती है। धनियर राजा को कोट, कुर्ता,धोती,टाई,साफा घड़ी,अंगूठी पहनाकर सजाया जाता है।रणुबाई की गोद में रहने वाले बालक के लिए भी कपड़े और टोपी ली जाती है।शृंगार कर रथ तैयार किए जाते हैं।

छोटी-छोटी टोकरियों में चार देवियों के स्वरूप गौर की मूर्ति, ईसर (शिव), कनीराम, रोवा बाई, सोवा बाई (कनीराम, रोवा बाई और सोवा बाई ईसरजी के भाई-बहन हैं) औरबालकों के स्वरूप में छोटे-छोटे दीपकों में सरावले बोए जाते हैं।एक बड़े टोकरे में धनियर राजा बोए जाते हैं।चैत्रवदी एकादशी को सुबह घर की सुहागिने स्नान करके नवीन वस्त्र पहनकर तैयार होती है I तब तक घर के बुजुर्ग बांस के कारीगर के यहां से नगद नेग देकर बांस की चार चार टोकनिया ले आते है।

चारों देवियों एवं सरावले व धनियर राजा के जवारों का नित्य अति शुद्धता पूर्व पूजन एवं सिंचन जिस कमरे में किया जाता है उसे माता की कोठरी या वाड़ी कहते हैं।स्त्रियां पूजा करते हुए दूब से पानी के छींटे देते हुए “गोर गोर गोमती” गीत गाती हैं। इस दिन पूजन के समय रेणुका की गौर बनाकर उस पर महावर, सिन्दूर और चूड़ी चढ़ाने का विशेष प्रावधान है।चन्दन, अक्षत, धूपबत्ती, दीप, नैवेद्य से पूजन करके भोग लगाया जाता है।माताजी की वाड़ी में प्रतिदिन शाम को स्त्रियां एकत्रित होकर मंगल गीत गाती हैं..

पीयर को पेलो जड़ाव की टीकी,
मेण की पाटी पड़ाड़ वो चंदा…
कसी भरी लाऊं यमुना को पाणी…
हारी रणुबाई का अंगणा म ताड़ को झाड़।
ताड़ को झाड़ ओम म्हारी
देवि को र्यवास।
रणु बाई रणु बाई, खोलो किवाड़ी…।

लोक साहित्यकार इसे गीती पर्व भी कहते हैं।निमाड़ी लोकगीतों में समावेश दैनिक दिनचर्या का सुंदर वर्णन होता है।यह पर्व भक्ति, श्रद्धा व श्रृंगार का है,महिलाएं विशेष श्रृंगार कर रणुबाई के जीवन रंग का बखान करती हैं।सुहाग की रक्षा एवं घर परिवार में सुख शांति और समृद्धि के लिए व्रत करती हैं।तंबोल यानी गुड़,चने,जुवार, मक्के की धानी, मूंगफली) बांटी जाती है।

माता के विसर्जन से पूर्व जो लोग माता के रथ लाते हैं,सुंदर रथ श्रृंगार कर,वाड़ी पूजन के पश्चात घर ले जाते हैं।सायंकाल सभी रथों को पूजकर झालरिया गीत गाए जाते हैं और आरती की जाती है..
आरती –
पयला पयेर की वो रणुबाई आरती I
हो आरती सरसो उग्यो गरबो I
बाण तो गढ़पर्वत को राजवाई I
हो राजवडा नS राल्यो ओ I
तमोल तो भींजS रणुबाई की I
चुन्दड़ी भींज तो भींजणS देवो I
म्हारी सय्यर और रंगावा I
दूसरी पयेर की वो रणुबाई आरती I
हो आरती …
इस पर्व में एक और रोवकता होती है युवतियों को गृहस्थी की सीख…इन दिनों युवतियां फूल पाती खेलती हैं।लाड़ा-लाड़ी (दूल्हा – दुल्हन) बनती है उनके विवाह का स्वांग रचाया जाता है।वह बुजुर्गों का आशीर्वाद लेती हैं और बुजुर्ग उन्हें रिश्तों का महत्व बताते हैं।उन्हें गृहस्थी की सीख देने के साथ नेग देते हैं।इसी नेग में सभी के खाने-पीने की व्यवस्था भी करनी होती है ताकि गृहस्थ जीवन में हिसाब किताब का संतुलन भी सीख जाएं।

नौवें दिन माता की मान-मनौती वाले परिवार रथ बौड़ाकर या पंचायत द्वारा माता को पावणी (अतिथि) लाते हैं।यह माना जाता है कि बहन,बेटी को नौवें दिन ससुराल नहीं भेजना चाहिए इसीलिए दसवें दिन पुनः सपरिवार भोजन प्रसादी का आयोजन होता है और माताजी को बुचका यानी जिसमें माताजी की समस्त श्रृंगार सामग्री, प्रसाद,भोग, श्रीफल एवं आवश्यक वस्तुएं होती है,पीली चुनरी के साथ बांधकर दिया जाता है और हंसी-खुशी विदाई दी जाती है।यही परंपरा सदियों से निर्बाध चली आ रही है।

हमारे लोकपर्व मात्र धार्मिक ही नहीं विज्ञान और चिकित्सा की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ संतोष माैर्य बताते हैं चैत्र से वातावरण में परिवर्तन होता है,रोगाणु पनपते हैं। माता की बाड़ी से घर तक पूजा में गुगल, लोभान, घी,कपूर जलाया जाता है जिससे पर्यावरण शुद्ध होता है।जवारे,विटामिन व मिनरल्स के स्रोत हैं,इनमें विटामिन ए, बी, सी, ई और के, के अलावा अमीनो एसिड्स पाए जाते हैं जो एनिमिया,ब्लड प्रेशर, कब्ज, डेंड्रफ,आर्थराइटिज जैसी कई रोगों में लाभकारी सिद्ध होते हैं।

अगर आप भी निमाड़,मालवा की वास्तविक संस्कृति से परिचित होना चाहते हैं तो यहां मनाए जाने वाले पर्वों और त्योहारों में शामिल होइए इसी माध्यम से आप यहां की विशेष संस्कृति के अद्भुत दर्शन प्राप्त कर सकेंगे।

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