दुर्गेश कुमार साध
8 वर्ष के एक बच्चे ने अपने स्कूल में ब्रिटिश रानी विक्टोरिया के जन्मदिन पर बॉंटी जा रही मिठाई फेंक दी थी, क्योंकि उनका मानना था कि यह परतंत्रता की निशानी है। आखिर जिन अंग्रेजों ने भारत को परतंत्र बना रखा है, उनकी रानी के जन्मदिन से एक भारतीय का क्या लेना-देना! तीक्ष्ण बुद्धि का यह बालक केशव, जो बाद में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार कहलाए, ने 1925 में ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ की स्थापना की, जो आज विश्व का सबसे बड़ा सामाजिक एवं ‘गैर-राजनैतिक’ संगठन है।
डॉ. हेडगेवार यह अच्छी तरह से समझ गए थे कि हिन्दू समाज विभिन्न तरीक़ों से बँटा हुआ है और अगर अंग्रेज इस देश से चले भी गए, तब भी असंगठित होने के कारण स्वराज की स्थापना का उद्देश्य सफल नहीं हो पाएगा। देश को चलाने के लिए राष्ट्रीय भावना, राष्ट्रप्रेम एवं नि:स्वार्थ समर्पण अत्यावश्यक है। एक लम्बे समय की परतंत्रता ने भारतीयों के मन में ग्लानि का भाव भर दिया था और वे अपनी गर्वित संस्कृति की पहचान लगभग भूल चुके थे। अत: उन्होंने एक ऐसे संगठन की न केवल अवधारणा रखी, बल्कि उसे साकार रूप भी दिया, जहॉं राष्ट्र की बात हो, सनातन संस्कृति की बात हो, स्वराज की बात हो। संघ की प्रेरणा से आज लाखों लोगों के ‘व्यक्तित्व निर्माण’ का कार्य किया जा रहा है, जिनमें ‘राष्ट्रप्रथम’ की भावना विद्यमान है और वे अपने-अपने कार्यक्षेत्रों में कार्य करते हुए राष्ट्रकर्म में रत हैं।
उल्लेखनीय है कि कांग्रेस की नींव एक अंग्रेज जिसका नाम एलन ऑक्टेवियन ह्यूम था, ने रखी थी। ह्यूम ने कांग्रेस की स्थापना इस आशय से की थी कि यह संस्था भारतीयों के मन में अंग्रेजों के प्रति बढ़ते हुए रोष एवं असंतोष को कम करने के लिए एक ‘सेफ्टी वॉल्व’ साबित होगी। कांग्रेस के शुरूआती अंग्रेज अध्यक्ष क्रमश: जॉर्ज यूल (1888), विलियम वेडरबर्न (1889), अल्फ्रेड वेब (1894) और हेनरी जॉन कॉटन (1904) रहे थे। उन्होंने कांग्रेस को अपनी ‘बी टीम’ की तरह से चलाया।
कांग्रेस के नेताओं के अंग्रेजों से हमेशा ही मधुर संबंध रहे। कांग्रेस के जेल गए नेताओं से एक ‘राजनैतिक कैदी’ की तरह बर्ताव किया जाता था और उन्हें वे तमाम सुख-सुविधाऍं दी जाती थीं, जो बाहर स्वतंत्र रहते हुए उपलब्ध होती हैं – सिवाय नजरबंदी के। एक तरफ जहॉं कांग्रेसी नेताओं के प्रति अंग्रेज अत्यंत नर्म रूख अपनाए हुए थे, वहीं दूसरी ओर अन्य पार्टियों या संगठनों के कैदियों को न तो राजनैतिक कैदी का दर्जा प्राप्त होता था और न ही उन्हें कोई सुविधाऍं प्रदान की जाती थीं। उदाहरणस्वरूप भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरू इत्यादि को जेल में अनेकों अमानवीयताओं से गुजरना पड़ा, वहीं वीर सावरकर जैसे महापुरूष को कालापानी की ‘अण्डा सेल’ मिली, जहॉं उनसे कोल्हू के बैल की तरह जुतकर तेल निकलवाया जाता था एवं घण्टों उन्हें जंजीरों में बॉंधकर खड़ा रखा जाता था।
कोई भी संस्था अपने मातृ-संगठन से विचार पाती है एवं उन्हीं की प्रेरणा से वह कार्य करती है। अंग्रेजों की विचारधारा में न तो भारतीयता ही थी और न ही सनातन संस्कृति का भाव। अंग्रेजों का मूल मंत्र था – बॉंटो और राज करो। कांग्रेस के संबंध में स्वयं महात्मा गॉंधी का विचार था कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कांग्रेस को भंग कर दिया जाना चाहिए, मगर कई कारणों से यह संभव नहीं हो सका। कांग्रेस की विचारधारा में अभी तक वह परिवर्तन नहीं आ पाया है, जो कि एक राष्ट्रीय पार्टी में आना चाहिए। इनके नेता आतंकियों को ‘जी’ कहकर संबोधित करते हैं, उनके लिए रात को सुप्रीम कोर्ट खुलवा लिया जाता है, इनके नेता आज भी किसी अपराधिक घटना की निंदा, उसके धर्म और जाति के आधार पर ही करते हैं। ये लश्करे-तैयबा, इंडियन मुजाहिदीन पर तो चुप्पी साध लेते हैं, मगर आरएसएस को पानी पी-पीकर गाली देते हैं। यह तो कांग्रेस वाले ही जानें कि उन्हें आरएसएस से क्या दिक्कत है? क्या वे मातृभक्त, राष्ट्रभक्त हैं, यह समस्या है अथवा वह समाज में फैली विषमताओं को मिटाने के लिए जी-जान से कोशिश कर रहे हैं, यह दिक्कत है या फिर हिन्दू समाज में आज एक नव-जागरण दिख रहा है, वह संगठित होने लगा है, इसका डर है? यह कांग्रेस को स्पष्ट करना चाहिए।
पिछले दिनों कांग्रेस के एक नेता भारत भ्रमण पर निकले थे, जिसे वे ‘भारत जोड़ो’ यात्रा कहते आ रहे थे। उस यात्रा में अभी तक वे कोई भी सकारात्मक विमर्श तो खड़ा नहीं कर पाए, मगर वे उन लोगों से मिलते रहे, जिनका स्वयं का चरित्र ही संदेहास्पद है। वे लगातार भाजपा और आरएसएस पर झूठे आरोप लगाते आ रहे हैं, जो कि उनका स्वभाव है। आरएसएस, जिसके स्वयंसेवकों की प्रात:काल ही भूमि वंदन, वंदे मातरम् और भारत माता की जय से होती है, जो कि देश भर में लाखों सेवा प्रकल्प चला रहा है, पर कीचड़ उछालना अत्यंत ही निंदनीय और निकृष्ट मानसिकता से परिपूर्ण है। देश में संघ की भूमिका निर्विवाद एवं अपरिहार्य है।
कुछ समय पूर्व खण्डवा जिले में उनके एक भाषण में उन्होंने यह झूठ कहा कि ‘‘टंट्या मामा एवं बिरसा मुण्डा जी को पकड़वाने और फॉंसी दिलवाने में आरएसएस का हाथ है।’’ इन दोनों क्रांतिकारियों का बलिदान क्रमश: 1842 और 1875 में हुआ था और आरएसएस की स्थापना ही 1925 में हुई थी, तो इस घटनाओं में आरएसएस का हाथ होना पूर्णत: असत्य और हास्यास्पद है।
दूसरी ओर उन्होंने अपने भाषण में यह जिक्र भी किया कि इस देश के असली मालिक – ‘आदिवासी’ हैं! आखिर एक संप्रभु राष्ट्र का कोई भी ‘मालिक’ कैसे बन सकता है? भारत, इस पुण्यभूमि पर जन्म लेने वाले प्रत्येक भारतीय का है। इस पर प्रत्येक भारतीय का समान अधिकार है, न किसी का कम और न ही किसी का ज्यादा। उन्होंने क्या एक बार भी यह विचार किया कि यह सब बोलने से समाज पर क्या विपरीत परिणाम होंगे या हो सकते हैं? इससे समाज में आपसी विद्वेष और अलगाववाद ही फैलेगा। इसके पूर्व उन्हीं की पार्टी के प्रधानमंत्री ने कहा था कि ‘‘इस देश पर पहला अधिकार अल्पसंख्यकों का है।’’ इस तरह की सस्ती राजनीति से फौरी तौर पर पार्टी को अवश्य फायदा मिल सकता है, मगर देश के नागरिकों की इसमें हानि-ही-हानि होनी है। यह किस तरह की भारत जोड़ो यात्रा है, जिसमें निरंतर समाज को तोड़ने का कार्य किया जा रहा है!

