श्रीरंग वासुदेव पेंढारकर
मन संतोष सुनत कपि बानी ।
भगति प्रताप तेज बल सानी ॥
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना ।
होहु तात बल सील निधाना ॥
अजर अमर गुननिधि सुत होहू ।
करहुँ बहुत रघुनायक छोहू ॥
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना ।
निर्भर प्रेम मगन हनुमाना।।
बार बार नाएसि पद सीसा ।
बोला बचन जोरि कर कीसा ॥
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता ।
आसिष तव अमोघ बिख्याता ॥
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा ।
लागि देखि सुंदर फल रूखा ॥
रामचरितमानस की इन चौपाइयों के माध्यम से बाबा तुलसीदास ने महाबली हनुमान के पूरे चरित्र को वाचक के समक्ष खड़ा कर दिया है। इतने कम शब्दों में महाबली हनुमान जैसे चरित्र की विशालता को समेट देना बाबा तुलसीदास जैसे महाकवि के लिए ही संभव है।
यह प्रसंग सुंदरकांड का है। जब हनुमान जी माता सीता के सामने अशोक वाटिका में स्वयं को प्रस्तुत करते हैं और उन्हें यह विश्वास दिला देते हैं कि वह श्री राम के दूत है और यह भी कि शीघ्र ही श्री राम वानरों की सेना लेकर श्रीलंका पहुंचेंगे और रावण को पराजित कर माता सीता को मुक्त कर लेंगे। इस संवाद के पश्चात माता सीता एक संदेह प्रकट करती है और कहती हैं कि राक्षस विशालाकार और बलवान है और ऐसी स्थिति में छोटे-छोटे वानर उनसे कैसे सामना करेंगे? इस पर महाबली हनुमान अपना वास्तविक स्वरूप माता सीता को दिखाते हैं और माता सीता को यह विश्वास हो जाता है कि ये वानर साधारण नहीं है और ये राक्षसों का नाश कर सकते हैं।
इसके पश्चात प्रसन्न होकर माता सीता हनुमान जी को आशीर्वाद देती है:
होहु तात बल सील निधाना
अजर अमर गुननिधि सुत होहू
करहुँ बहुत रघुनायक छोहू
हे पुत्र, तुझे बल मिले, शील मिले, तू अजर (रोगहीन) रहे, अमर रहे, गुणवान बने और श्रीराम का तुझ पर अखण्ड प्रेम बना रहे!
यह विलक्षण आशीर्वाद पा कर हनुमान जी भाव विभोर हो जाते हैं। वस्तुत: माता सीता ने अपने आशीर्वचनों में हनुमान जी को वह सब कुछ दे दिया, जिसकी एक भक्त कल्पना कर सकता है। गदगद हो कर हनुमान जी माता से कहते हैं-
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता ।
आसिष तव अमोघ बिख्याता ।।
हे मां, यह सर्वविदित है कि आपका आशीर्वाद अमोघ है। जो आपने कहा है, वह होकर ही रहेगा। और ऐसा विलक्षण आशीर्वाद पा कर मैं कृतकृत्य हूं।
इसके बाद की चौपाई अद्भुत है। जिस व्यक्ति को अचानक श्री राम के अखण्ड प्रेम और अमरता का खजाना प्राप्त हुआ हो, उस व्यक्ति में यदि अहंकार बढ़ जाए तो उसे सामान्य ही माना जायेगा। परन्तु हनुमान तो असामान्य थे। उन्हे यह पता था कि वे एक माध्यम मात्र है बाकी जो हो रहा है, वह तो श्री राम की कृपा से ही हो रहा है। तुलसीदास जी ने हनुमान जी की अहंकार हीनता बताते हुए अगली चौपाई में कहा है :
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा ।
लागि देखि सुंदर फल रूखा
हे मां, इस अशोक वाटिका के स्वादिष्ट फल देख कर, मुझे बड़ी भूख लगी है! आगे वे माता सीता से फल तोड़ कर खाने की अनुमति मांगते हैं। तुलसी ने एक वाक्य में जता दिया कि हनुमान पूर्णतः अहंकार विहीन है क्योंकि अजर अमर होने का वरदान प्राप्त होने पर खुशी मनाने के स्थान पर वे अपने वानर होने का परिचय देते हुए भूखा होने की बात करते है। उन्हे अदभुत आशीर्वाद मिला है। उन्हे पता है कि यह आशीर्वाद अचूक है और ऐसा होकर ही रहेगा। परन्तु इस अच्युत, अनन्त निधि के मिलने के पश्चात भी वे किसी अबोध बालक की तरह भूख की बात कर रहे हैं।
प्रभु आपको सब कुछ दे सकते हैं, या यूं कहें कि आपको जो मिला है वह प्रभु का ही आशीर्वाद है, इसलिए गर्व रहित हो कर उसे स्वीकार करें और स्वयं को सरल, निर्मल बनाए रखें। यही हनुमान जी की विशेषता थी। वे स्वयं की सारी उपलब्धियों का श्रेय श्रीराम के चरणों में अर्पित कर देते हैं:
सो सब तव प्रताप रघुराई।
नाथ न कछु मोरी प्रभुताई।।
ऐसे मोह रहित, बाल सुलभ सरल स्वभाव वाले, महावीर, अजर,अमर श्री हनुमान जी की अवतरण तिथि पर सभी मित्रों को शुभकामनाएं। महाबली, मारूतनंदन हनुमान आपकी रक्षा करें आप सभी को अनुगृहित करें।


बहुत सुंदर।