शक्ति का सामाजिक उपयोग: सहयोग से बनता है समृद्ध समाज

श्रीरंग वासुदेव पेंढारकर

हिरण्यकश्यप की कथा सर्वविदित है। कथा में उसे ब्रह्मा जी ने वरदान दे दिया था कि उसे न मनुष्य मार पाएगा न पशु, न किसी अस्त्र से न किसी शस्त्र से, न घर में न बाहर, न दिन में न रात में न भूमि पर न आकाश में! एक तरह से इतने ही घातक वरदान भस्मासुर और रावण सहित कुछ अन्य असुरों ने भी अलग अलग युगों में प्राप्त कर समाज के लिए भयंकर समस्याएं खड़ी की थी।

बचपन में अक्सर मन में आता था कि देवता ऐसे वरदान देते ही क्यों थे? परन्तु अब लगता है कि इन पौराणिक कथाओं को कुछ अलग दृष्टि से भी देखा जा सकता है। क्या हम तपस्या को एक व्यवस्था मान सकते हैं? एक व्यवस्था जिसमें कुछ वर्षों तक आपसे कठोर परिश्रम अपेक्षित रहता था और उसके परिणाम के रूप में आपको कुछ शक्तियां सौंप दी जाती थी, इस विश्वास के साथ कि आप इनका सदुपयोग करेंगे। शायद अधिकांश लोग सदुपयोग ही करते रहे होंगे इसीलिए यह व्यवस्था लंबे समय तक चलती रही।

परन्तु भस्मासुर, तारकासुर और महिषासुर जैसे असुरों ने इस व्यवस्था का दुरुपयोग किया। इन असुरों ने तपस्या की इस व्यवस्था से शक्तियां प्राप्त कर निरंकुश सत्ता हासिल कर ली और उसका दुरुपयोग अपनी विलासिता, अपने अहंकार और अपने स्वार्थ की सिद्धि हेतु करने लगे।

आज के युग में यदि प्रजातांत्रिक चुनाओं को तपस्या कि जगह रखा जाय तो दिल्ली का निर्लज्ज ठग निश्चय ही असुरों की सूची में शीर्ष पर होगा। एक अच्छी खासी व्यवस्था का लाभ उठाते हुए सत्ता रूपी शक्तियां प्राप्त करना और फिर उस सत्ता का रणनीतिक दुरुपयोग कर समाज को अवनति की ओर धकेलने का इससे निकृष्ट उदाहरण शायद ही देखने को मिले। पौराणिक काल में ऐसे असुरों का देवताओं को हनन ही करना पड़ता था। इस युग में शारीरिक हनन की जगह संवैधानिक कार्यवाही की सुविधा है। आशा करें कि जिम्मेदार संस्थाएं निर्णायक कार्यवाही कर इस तिहाड़वासी कदाचारी से समाज को शीघ्र मुक्ति दिलवाएंगी।

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