श्रीरंग वासुदेव पेंढारकर
रोहित वेमुला हैदराबाद विश्वविद्यालय में Ph D के छात्र थे। उन्हे शोध के दौरान मिलने वाला भत्ता भी प्राप्त हो रहा था। रोहित दलित थे और विश्वविद्यालय में दलित राजनीति में सक्रिय थे। 2015 में विश्वविद्यालय की ओर से उनका वजीफा बन्द हो गया। इस पर उनके मित्रों द्वारा यह आरोप लगाया गया कि ऐसा उनके द्वारा विश्विद्यालय में किए गए राजनीतिक प्रदर्शन की वजह से किया गया है। विवि ने इससे इंकार करते हुए स्पष्ट किया कि वजीफा प्रशासकीय विलम्ब की वजह से बन्द हुआ है।
इसके बाद आरोप प्रत्यारोपों का दौर चलता रहा। केंद्र में भाजपा के मंत्री बंडारू दत्तात्रय ने इस सम्बंध में केंद्रीय शिक्षा मंत्री को पत्र लिख उचित कार्यवाही करने का अनुरोध किया। इस बीच विवि द्वारा पूरे मामले की जांच की गई और रोहित और उनके कुछ मित्रों को निष्कासित कर दिया। चन्द दिनों पश्चात रोहित ने आत्महत्या कर अपना जीवन समाप्त कर लिया।
इसके पश्चात मीडिया, तथाकथित वामपंथी सार्वव्यवस्था (इको सिस्टम) तथा विपक्ष द्वारा जो राजनीति की गई वह देश की निम्न स्तर की राजनीति की पराकाष्ठा थी। केंद्रीय मंत्रियों बंडारू दत्तात्रय और स्मृति ईरानी (तत्कालीन शिक्षा मंत्री) को निशाना बनाया गया। पूरे मामले को सवर्णों द्वारा दलितों के अपमान और अत्याचार का आवरण पहना कर भयंकर शोर मचाया गया। टीवी चैनलों की बहसों, पत्रिकाओं के आलेखों, समाचार पत्रों के संपादकियों, सोशल मीडिया के हैंडलों आदि के माध्यम से अनियंत्रित आग उगली गई। पूरे देश में भाजपा को, विशेष कर मोदी के नेतृत्व में बनी केंद्रीय सरकार को दलित विरोधी सिद्ध करने की होड़ मच गई। पूरा सार्वतंत्र एक लय, एक ताल और एक सुर में मोदी भाजपा को दलित विरोधी बता कर गरियाने में जुट गया था। अन्ततः दोनो मंत्रियों के त्यागपत्र लेकर ही यह बेमतलब का बवंडर थम पाया। इस बीच भाजपा के बंडारू दत्तात्रय एवं अन्य नेताओं पर आत्महत्या हेतु उकसाने के सम्बंध में प्राथमिकी भी दर्ज की गई थी।
आज लगभग सात वर्षों के बाद पुलिस द्वारा इस प्राथमिकी के सम्बंध में दर्ज की गई खात्मा रिपोर्ट में पुलिस ने यह स्वीकार किया है कि रोहित वेमुला दलित थे ही नहीं! उनका अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र भी फर्जी पाया गया। पुलिस द्वारा यह भी स्पष्ट किया गया कि ऐसे कोई सबूत नहीं मिले जिनसे यह सिद्ध हो सके कि रोहित को आत्महत्या के लिए उकसाया गया हो। पुलिस के अनुसार उनके अनुसूचित जाति के होने के फर्जी प्रमाण पत्र की असलियत उजागर होने का तनाव ही उनका आत्महत्या की असली वजह था। उनके आत्महत्या के पूर्व लिखे गए पत्र में रोहित ने भी यही लिखा था कि उनकी आत्महत्या के लिए वे स्वयं ही उत्तरदाई थे और यह कि किसी के उकसाने से वे यह कदम नहीं उठा रहे हैं। जिन नेताओं पर आरोप लगाए गए थे वे सभी आज बाइज्जत बरी हो चुके हैं।
लेकिन इस मामले को जिस तरह एक बड़ा मुद्दा बनाया गया, पूरे सार्वतंत्र ने जिस योजनाबद्ध तरीके से इसे दलित विरोधी रंग दिया, विपक्ष के शीर्ष नेताओं ने जिस तरह से इस पर दलित आधारित निम्नस्तरीय राजनीति की चालें चली और जिस तरह से संसद में इस मुद्दे पर शोर मचा कर संसद की कार्यवाही में रूकावटें डाली गई यह सब भारतीय राजनीति के अधोपतन की मिसाल बन गया।
विगत दस वर्षों में विपक्ष की राजनीति इसी प्रकार के आधारहीन मुद्दों पर चल रही है। राफेल सौदा, पेगासस फोन टैपिंग, ईवीएम हैकिंग, धारा 370 के हटाये जाने का असंवैधानिक होना आदि तमाम मसले जो विपक्ष ने मोदी सरकार के विरुद्ध उठाए हैं, जिन पर संसद के कईं सत्र बर्बाद किए गए और जिन पर प्रसार माध्यमों पर घण्टों बहसें की गईं वे सभी एक एक कर न्यायालयों की सुनवाइयों में आधारहीन और तथ्यों से परे पाए गए हैं। परन्तु विपक्ष लगातार इन झूठे और गढ़े गए मुद्दों पर राष्ट्र को गुमराह करता है, समाज में वैमनस्य बढ़ाता है और राजनीति को राष्ट्रहित के मुद्दों से हटा कर भ्रामक प्रपंच की ओर ले जाता है।
क्या इस प्रकार के व्यवहार के लिए विपक्ष की जिम्मेदारी तय नहीं होना चाहिए? आज कईं बार रास्ते पर की गई हिंसा से हुए नुकसान की भरपाई प्रदर्शनकारियों से करवाई जाती है। क्या भ्रामक और झूठ आधारित दुष्प्रचार से होने वाली हानि की भरपाई जिम्मेदार दलों, व्यक्तियों या माध्यमों से नहीं होना चाहिए?

