“परिवर्तन की कदम चूमती चाल: भारतीय जूतों का नया अध्याय आराम और मानकों में।”

श्रीरंग वासुदेव पेंढारकर

बचपन में जब नए जूते खरीदे जाते थे तो कभी कभी बड़ी विडम्बना का सामना करना पड़ता था। शुरुआती कुछ दिनों तक जूता पैर पर तंग रहता था और साधारण गुणवत्ता का चमड़ा या प्लास्टिक होने से पैर के पंजे छिल जाते थे। स्थानीय बोलचाल में इसे जूते का काटना बोला जाता था। आज भी अक्सर यह सुनने में आता है कि “ 7 नंबर जूता मुझे छोटा पड़ता है और 8 नंबर का बड़ा” या यह कि “जूते की लंबाई तो ठीक है पर चौड़ाई में तंग पड़ता है”। ये तमाम वे छोटी छोटी शिकायतें हैं जो हमारे जीवन को प्रभावित तो करती है परन्तु हम इन्हें गंभीरता से नहीं लेते। मुख्यतः इसलिए कि इनका कोई समाधान नहीं है। 8 नम्बर जूता 8 नम्बर ही रहेगा, समझौता हमें ही करना है।

लेकिन आने वाले समय में जूतों सम्बंधी इन समस्याओं के सुलझने की प्रबल संभावनाएं हैं। वस्तुत: इन समस्याओं के मूल में जूतों के आकार की पश्चिमी प्रणाली रही है। जूतों के नाप के अंक 7,8 या 9 आदि पैर के किसी निश्चित आकार से जुड़े रहते है। इन आकारों के मानक अमेरिका या इंग्लैंड में किए गए सर्वेक्षणों पर आधारित है। पश्चिमी समाज के लोगों पर शतकों पूर्व किए गए इन सर्वेक्षणों के आधार पर जो मानक तय किए गए, हम आज तक उन्ही मानकों पर बने जूते पहन रहे हैं। तथ्य यह है कि भारतीय मूल के लोगों के पैर और पश्चिमी लोगों के पंजे के आकार प्रकार में मूलभूत अन्तर है। भारतीय पंजे पश्चिमी लोगों के पंजों से कुछ ज्यादा चौड़े होते हैं। इसलिए पश्चिमी मानकों पर बने जूते हमे आराम नहीं दे पाते हैं। चिकित्सकों का कहना है कि लम्बे समय तक गलत नाप के जूते पहनने की वजह से टखने, घुटने आदि में दर्द रहने से लेकर रीढ़ की हड्डी एवं कूल्हों के जोड़ों की समस्याएं भी पैदा होने की संभावना रहती है।

अब सरकार द्वारा भारतीय मानक तय करने की प्रक्रिया प्रारंभ की गई है। केंद्रीय चमड़ा अनुसन्धान संस्थान (CLRI) एवं उद्योग एवं आंतरिक व्यापार विकास विभाग (DPIIT) द्वारा संयुक्त रूप से एक सर्वेक्षण किया गया जिसमे एक लाख भारतीय लोगों के पैरों के पंजों के आकार प्रकार का अध्ययन कर जूतों के लिए भारतीय मानक तैयार किए गए हैं। ये मानक भा (BHA) मानक कहलाएंगे। भा अक्षर भारत से लिया गया है। जाहिर है, इन मानकों पर बने जूते भारतीय ग्राहकों के लिए अधिक आरामदायक होंगे।

महत्वपूर्ण यह है कि सरकार के स्तर पर इस बारे में विचार किया गया, निर्णय लिए गए और उन निर्णयों का क्रियान्वयन भी हो रहा है। पहले इन मानकों से बने जूतों के साथ 10,000 व्यक्तियों पर प्रयोग किया जायेगा, आवश्यक सुधार किए जायेंगे और 2025 तक इन मानकों पर बने जूते बाजार में आने लगेंगे।

बात सिर्फ जूतों के नाप तक सीमित नहीं है। यह वैश्विक वर्चस्व की स्पर्धा का भी हिस्सा है। विगत कुछ शतकों से पूरे विश्व में पश्चिमी देशों का दबदबा कायम है। पूरे विश्व में खान पान, पहनावा, फैशन, व्यापार करने का तरीका, शिक्षा पद्धति, व्यापार में उपयोग में आने वाली मुद्रा आदि जीवन के अधिकांश अंगों का संचालन अमेरिका, इंग्लैंड और अन्य पश्चिमी देशों से होता रहा है। दवाइयों के मानक, खाद्य सामग्रियों के मानक, देशों की आर्थिक स्थिति के मानक, वैज्ञानिक अनुसन्धान के मानक ये सब न्यूयॉर्क या वॉशिंगटन या लंदन में बैठ कर तय किए जाते हैं और पूरे विश्व पर थोप दिए जाते हैं।

नया भारत इस अवांछित वर्चस्व को चुनौती दे रहा है। तीस से अधिक देशों से भारत अपनी मुद्रा यानी रुपए में व्यापार कर रहा है। यह संख्या बढ़ रही है। हम अपने वैक्सीन खुद बनाने लगे हैं। हम स्वदेशी तकनीक से हथियार और युद्धक विमान बना कर उनका निर्यात करने लगे हैं। हमने भुगतानों को आसान बनाने के लिए UPI व्यवस्था को विकसित किया है, जो विश्व में किसी और देश के पास नहीं है। फ्रांस जैसा विकसित देश भी UPI व्यवस्था भारत से लेने के लिए बाध्य है। चरण पादुकाओं के लिए बने ‘भा’ मानक भी इस दिशा में एक छोटा किंतु महत्वपूर्ण कदम है। यह पश्चिमी दबदबे से बाहर निकलने का एक और प्रमाण है।

Make in India के कार्यक्रम के तहत विकसित यह मानक प्रणाली है तो पैरों को आराम देने के लिए किन्तु इस वजह से आप अपना सर भी गर्व से ऊंचा कर सकते हैं। क्योंकि अब हम उस दौर में प्रवेश कर चुके हैं जहां भारत, भारतीयों की सुख सुविधा को ध्यान में रखते हुए अपने अनुसन्धान के आधार पर अपनी प्रणालियां, व्यवस्थाएं, उत्पाद और सेवाएं विकसित कर रहा है। 18, मई 2014 के अपने अंक में इंग्लैंड के दैनिक गार्जियन ने नरेन्द्र मोदी की विजय का समाचार प्रकाशित करते हुए लिखा था कि ‘मोदी की इस जीत के साथ अंग्रेजों की भारत से अन्तिम विदाई हो चुकी है..’। इस कथन के प्रमाण अब स्पष्ट नजर आने लगे हैं।

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